नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने कथित तौर पर दहेज के लिए बहू के साथ क्रूरता करने के 24 साल पुराने केस में ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा दोषी करार दी गई एक सास को बरी कर दिया। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ससुराल वालों द्वारा बहू को दहेज के लिए प्रताड़ित की बातें हवा से भी अधिक तेज फैलती हैं। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ शुक्रवार को एक याचिका पर यह फैसला सुनाया, जिसमें महिला की दोषसिद्धि और तीन साल की सजा बरकरार रखी गई थी।
आरोपी सास को आईपीसी की धारा 498ए के तहत इस आधार पर दोषी ठहराया गया था कि उसकी मृत बहू ने अपने मायके वालों को दहेज उत्पीड़न होने की बातें बताई थीं।आईपीसी की धारा 498-ए, विवाहित महिला के प्रति उसके पति या उसके ससुरालवालों द्वारा की गई क्रूरता के अपराध से संबंधित है।
सुप्रीम कोर्ट ने पड़ोसन की गवाही को माना अहम
सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि ने इस बात पर गौर किया कि केस में गवाह के तौर पर पेश हुई आरोपी महिला की पड़ोसी ने दावा किया कि बहू से कभी दहेज की मांग नहीं की गई थी। बेंच ने कहा, ‘‘सास के साक्ष्य को निचली अदालत और हाईकोर्ट द्वारा इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि वह दहेज की मांग के संबंध में कोई तथ्य पेश नहीं कर सकी थी, क्योंकि यह चारदीवारी के भीतर होता है, जो एक गलत निष्कर्ष है, विशेष रूप से ऐसे मामलों में जब सास-ससुर द्वारा दहेज के लिए बहू को परेशान किए जाने की बातें हवा से भी तेज फैलती हैं।"
जून 2001 में दर्ज कराई गई थी शिकायत
मृतक बहू के पिता ने जून 2001 में दर्ज कराई अपनी शिकायत में बताया था कि उनकी बेटी ससुराल में मृत पाई गई थी। पिता ने आरोप लगाया था कि मौत के समय उनकी बेटी गर्भवती थी और वह अक्सर मायकेवालों को बताती थी कि उसकी सास दहेज के लिए उसे ताने ताने मारती है।
शिकायतकर्ता ने यह भी कहा कि घटना के वक्त उसका दामाद शहर में नहीं था। मृतका के सास-ससुर और देवर को इस मामले में आरोपी बनाया गया था। हालांकि, निचली अदालत ने ससुर और देवर को बरी कर दिया, लेकिन यह माना कि सास के उत्पीड़न के कारण बहू ने जान दी थी। दोषी करार दी गई सास ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया, जिसने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी रूप में दहेज की मांग अपने आप में आईपीसी की धारा 498ए के तहत केस दर्ज करने के लिए काफी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "इसी प्रकार, किसी विवाहित महिला को या उसके रिश्तेदार को किसी अवैध मांग को पूरा करने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से परेशान करना भी 'क्रूरता' की श्रेणी में आएगा।'' बेंच ने आरोपी महिला की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और उसे बरी कर दिया।
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