अगस्त माह में पशुओं को खुरहा-मुंहपका रोग का रहता है खतरा
पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग ने अगस्त माह के अपने पशुपालक कैलेंडर में दी जरूरी सलाह
इन उपायों से पशुओं को खुरहा-मुंहपका और गलाघोंटू रोग से बचा सकते हैं
इस महीने पशुओं को स्वस्थ रखने के लिए खनिज मिश्रण 30-50 ग्राम प्रतिदिन दें
पशुओं में रोगों के लक्षण दिखते ही पशु चिकित्सक से संपर्क करें पशुपालक
पटना,
बिहार सरकार का पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग पशुओं के स्वास्थ्य का खास ध्यान रख रहा है। इन दिनों यानी अगस्त माह में पशुओं का ध्यान कैसे रखा जाए इसके लिए विभाग ने पशुपालक कैलेंडर जारी किया है, जिसमें एफएमडी रोग अर्थात खुरहा-मुंहपका रोग से बचाव के उपायों पर जोर दिया गया है।
कैलेंडर में विभाग ने कहा है कि पशुओं के खुरहा-मुंहपका रोग से ग्रसित होने पर रोगग्रस्त पशुओं को अलग रखें एवं ग्रसित पशुओं की खान-पान की व्यवस्था भी अलग से करें। साथ ही, खुरहा-मुंहपका रोग से ग्रसित पशुओं के दूध को उसके बछड़ों को न पीने दें। ऐसा करने से बछड़े संक्रमित होने से बचेंगे एवं स्वस्थ रहेंगे।
आपके पशुओं में मुंहपका-खुरपका (Foot and Mouth Disease) रोग का प्रकोप है, तो इसे स्वस्थ पशुओं से अलग रखें। यदि आस-पास के पशुओं से यह रोग फैल रहा है तो अपने पशुओं का सीधा संपर्क रोगी पशुओं से नहीं होने दें।
वहीं गलाघोंटू (Haemorrhagic Septicaemia), जहरवात एवं अन्य रोग के लक्षण दिखते ही तुरंत पशु चिकित्सक से सम्पर्क करें। भेड़, बकरियों में पी.पी.आर., भेड़ चेचक रोग होने की संभावना रहती है। अतः बचाव के लिए टीके निश्चित रूप से लगवा लें।
पशुओं को स्वस्थ रखने के लिए खनिज मिश्रण 30-50 ग्राम प्रतिदिन दें, जिससे पशुओं में दूध उत्पादन के साथ ही शारीरिक तंदुरुस्ती बनी रहे। पशुओं को अत्यधिक तापमान एवं तेज धूप से बचाने के लिए उपाय करें।
अत्यधिक संक्रामक रोग है एफएमडी
फुट-एंड-माउथ डिजीज (एफएमडी), जिसे खुरपका-मुंहपका रोग भी कहा जाता है। यह पशुओं विशेषकर गाय, भैंस, भेड़, बकरी और सुअर में होने वाला एक अत्यधिक संक्रामक वायरल रोग है। यह रोग पिकोर्नावायरस परिवार के एफ्थोवायरस के कारण होता है। इसके लक्षणों में बुखार, मुंह और पैरों में छाले, लार बहना और लंगड़ापन शामिल हैं। यह रोग पशुओं की उत्पादकता को प्रभावित करता है, जिससे दूध उत्पादन और वजन में कमी होती है। एफएमडी का प्रसार संक्रमित पशुओं, दूषित उपकरणों या हवा के माध्यम से होता है। रोकथाम के लिए टीकाकरण, स्वच्छता और जैव-सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं। यह मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक नहीं है।
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